पद 1
शिकारी आयेगा जाल बिछायेगा
खुद को छिपायेगा (2)
पंख फैला कर मैं उड़ूँगा
और न डरूँगा, और न डरूँगा
पद 2
शैतान आयेगा, जाल बिछायेगा
खुद को छिपायेगा (2)
पंख फैला कर मैं उड़ूँगा
और न डरूँगा, और न डरूँगा
"जब यह पंक्ति आती है — “जाल” — तो भजन संहिता 91:3 याद आता है। वह तुझे पक्षियों के फंदे से बचाएगा।"
"जब गीत कहता है — “उड़ूँगा” — तो यशायाह 40:31 याद आता है। वे उकाबों के समान पंख फैलाएंगे।"
"और जब कहा जाता है — “डरूँगा” — तो भजन संहिता 23:4 दिल में आता है। मैं किसी बुराई से न डरूँगा।"
"यह गीत शिकारी जाल बिछाने और उड़ने का गीत है।"
"किसी प्रार्थना सभा में भाई-बहन इसे गाते हैं, कोई अकेला कमरे में बैठकर गुनगुनाता है, और लगता है जैसे पंख पास आ गए हों।"
"छिपायेगा, उड़ूँगा, और डरूँगा — यही इस गीत की गहराई है।"
"जब शिकारी आए तो जाल बिछाएगा।"
"पंख फैला कर उड़ूँगा और न डरूँगा।"
"शैतान भी आए तो वही होगा।"
"सीख यह है कि न डरूँगा।"
"इस भजन के शब्द जाल को इतनी साफ हिंदी में रखते हैं कि सुनते ही उड़ने की याद आती है।"
"आपकी लेखनी लोगों को पंख और डर की ओर खींचती है।"
"इस गीत को आराधना में रखने वाले सबको दिल से आभार। 🙏"
"Thank you for a song that flies above the hunter's snare. ❤️"
Kidhar Ja Rahe Ho
किधर जा रहे हो