मन मंदिर में बसने वाला, यीशु तू है निराला (2)
पद 1
जिसके मन में तू जन्म ले, अविनाशी आनन्द से भर दे
आदि अनंत प्रीति रीति की जल जायेगी ज्वाला
पद 2
मूसा को तूने पास बुलाया, स्वर्ग लोक का भवन दिखाया (2)
महा पवित्र स्थान में रहकर, आप ही उसे सम्भाला (2)
पद 3
पाप में दुनिया डूब रही थी, परमपिता से दूर हुई थी
प्रभुता अपनी आप ही तजकर, रूप मनुष्य ले आया
पद 4
प्रेम हमें अनमोल दिखाया, प्रेम के खातिर रक्त बहाया
क्रूस पर अपनी जान देकर, पाप से हमें छुड़ाया
पद 5
हर विश्वासी प्रेम से आये, खुशी से अपनी भेंट चढ़ायें
अंधकार सब दूर हुए अब, मन में हुआ उजाला
"जब यह पंक्ति आती है — “मन मंदिर में” — तो 1 कुरिन्थियों 3:16 याद आता है। क्या तुम नहीं जानते कि तुम परमेश्वर का मन्दिर हो।"
"जब गीत कहता है — “रूप मनुष्य ले आया” — तो फिलिप्पियों 2:7 याद आता है। उसने अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया, और दास का स्वरूप धारण किया।"
"और जब कहा जाता है — “रक्त बहाया” — तो इफिसियों 1:7 दिल में आता है। उसके लहू के द्वारा हमें छुटकारा मिला है।"
"यह गीत मन के मंदिर में बसने वाले का गीत है।"
"किसी प्रार्थना सभा में भाई-बहन इसे गाते हैं, कोई अकेला कमरे में बैठकर गुनगुनाता है, और लगता है जैसे उजाला पास आ गया हो।"
"ज्वाला, प्रभुता, और भेंट — यही इस गीत की गहराई है।"
"मन में जन्म लेने से आनन्द भरता है।"
"प्रेम के खातिर जान दी।"
"सीख सीधी है — भेंट चढ़ाओ, अंधकार दूर होता है।"
"इस सुंदर भजन के लिए दिल से धन्यवाद। आपने मंदिर को इतनी सरल हिंदी में गाया कि आराधना में दिल प्रार्थना में डूब जाता है। आपकी लेखनी और आपकी आवाज़ — दोनों के लिए दिल से आभार। Thank you for giving us a song that touches the heart and leads us into worship."
Kidhar Ja Rahe Ho
किधर जा रहे हो