हृदय भेंट चढ़ाएं प्रभु को प्रभु को स्तुति प्रशंसा करें
हम सब सन्त मिलकर (2)
पद 1
पाप का भार उठाने, आया मसीह जग में (2)
पापियों के सब पाप मिटाने (2) जीवन सनातन दिया
हृदय भेंट चढ़ाएं
पद 2
संकट क्लेश उठाया नम्र और दीन बनकर (2)
द्वार उद्धार का खोला प्रभु जी (2) सनातन आशा दी
हृदय भेंट चढ़ाएं
पद 3
आश्चर्य स्वर्गीय प्रेम, हम पापियों के लिए (2)
फिर मत जाना पापी जगत में (2) पाप में न फंस कर
हृदय भेंट चढ़ाएं
पद 4
अर्पण करते हैं तुझको, आत्मा, प्राण, देह भी (2)
रक्षा करो प्रभु इस जीवन की (2) विनती हमारी यही
हृदय भेंट चढ़ाएं
"जब यह पंक्ति आती है — “हृदय भेंट चढ़ाएं” — तो भजन संहिता 51:17 याद आता है। भग्न और पिसे हुए मन का बलिदान तू तुच्छ नहीं जानता।"
"जब गीत कहता है — “पाप का भार उठाने” — तो यशायाह 53:4 याद आता है। निश्चय उसने हमारे ही रोगों को सह लिया और हमारे ही दुखों को उठा लिया।"
"और जब कहा जाता है — “जीवन सनातन दिया” — तो यूहन्ना 10:28 दिल में आता है। मैं उन्हें अनन्त जीवन देता हूँ।"
"यह गीत सन्त मिलकर हृदय की भेंट चढ़ाने का गीत है।"
"किसी प्रार्थना सभा में भाई-बहन इसे गाते हैं, कोई अकेला कमरे में बैठकर गुनगुनाता है, और लगता है जैसे भेंट पास आ गई हो।"
"भार, द्वार, और अर्पण — यही इस गीत की गहराई है।"
"वह पाप का भार उठाने आया।"
"पापी जगत में फिर मत फँसो।"
"सीख सीधी है — आत्मा, प्राण, देह अर्पण करो।"
"इस सुंदर भजन के लिए दिल से धन्यवाद। आपने भेंट को इतनी सरल हिंदी में गाया कि आराधना में दिल प्रार्थना में डूब जाता है। आपकी लेखनी और आपकी आवाज़ — दोनों के लिए दिल से आभार। Thank you for giving us a song that touches the heart and leads us into worship."
Kidhar Ja Rahe Ho
किधर जा रहे हो